TULSI DAS

Tulsi Das is a one of the greatest poet of India.Tulsi Das is also known as Goswami Tulsidas.

JAI MATA DI

NAVA DURGA - Sailaputriti , Brahmacarini , Candraghanteti , Kusmandeti , Skandamateti , Katyayani , Kalaratrisca , Mahagauriti , Siddhidatri.

GANPATTI BAPPA MORYA

Vakra-Tunndda Maha-Kaaya , Suurya-Kotti Samaprabha ! Nirvighnam Kuru Me Deva , Sarva-Kaaryessu Sarvadaa !!

LAXMI MATA

Laxmi is the Hindu goddes of wealth and prosperity . Om Shree Mahalakshmyai Cha Vidmahe !Vishnu Patnyai Cha Dheemahi Tanno Lakshmi Prachodayat Om!!

SANT KABIR DAS

Sant Kabir Das is the mystical and great poet of India.Sant Kabir Das was born on 1440.

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Monday, 29 August 2016

RAHIM KE DOHE



Rahim ji


                     
                                 BHAGAT RAHIM KE DOHA


रहिमन देख बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय। 
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

रहिमह ओछे नरन सो, बैर भली ना प्रीत।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति विपरीत॥

रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग।
बाँटनवारे को लगै, ज्यौं मेंहदी को रंग॥

बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥

मन मोती अरु दूध रस, इनकी सहज सुभाय।
फट जाये तो ना मिले, कोटिन करो उपाय॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुये, जिन मुख निकसत नाहि॥

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

फूले फूले चुनि लिये, कालि हमारी बारि॥
रहिमन वे नर मर गये, जे कछु माँगन जाहि।

जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तलवारि॥
माली आवत देख के, कलियन करे पुकारि।

तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम। 
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम॥

छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात।
कह ‘रहीम’ हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात॥

खीरा को मुंह काटि के, मलियत लोन लगाय। 
रहिमन करुए मुखन को, चहियत इहै सजाय॥







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